Tuesday, December 31, 2013

नया साल नए वादे नई सोच … !!!

आखिरी रात का आखिरी पल,
 को याद रहे वो सारा पल,
कि प्यार कि शम्मा को जलाना ही होगा,
हिन्द-ए -हिंदुस्तान को बचाना ही होगा,
लग गई है जिसपे धार्मिक-राजनीत का कलंक,
न कोई गीता हो न कोई कुरान,
इंसा पे क़ुर्बान हो हज़ारों निशाँ,
इस बार तो हद ही करदी खूनी दरिंदों ने,
चाहे कोई राम पूजे या अल्लाह पुकारे,
कोई तो हो जिसके सामान अश्क हो,
ना हो हिन्दू न मुसलमाँ,
 सब एक इंसा हों,
साथ हो हम तो एक तूफ़ान क्या??
हज़ारों जमा बदल के रख देंगे,
जुल्म और ताकत से नहीं,
ये जमाना आबाद है तो इल्म से,
नफरत से नहीं ये जमाना आबाद है 
प्यार से.…।

नए साल में पैगाम दीजिये,
इंसा से इंसा के मोहब्बत का,
नए साल में वादा करें ,
फिर से न दोहरायंगे मुजफ्फरनगर,
आखिरी रात का आखिरी पल,
 को याद रहे वो सारा पल,
कि प्यार कि शम्मा को जलाना ही होगा,
हिन्द-ए -हिंदुस्तान को बचाना ही होगा..... ।।

Tuesday, September 3, 2013

दोस्ती की नाकामी …. !!

इन उम्मीदों का मंजिल क्या है??
अपने आप से पूछ रहा हूँ मैं,
 कसमकश जो कभी जंजीरे सी बन जाती,
हर बार कि तरह कुछ घन्टों की नाकाम कोशिशें ,
ना जाने मैं क्या सोचता इस तरह.…!!!

नाता भी अजीब सी है,हर पल अपनों का एहसास दिलाता,
कुछ एहसास सा हुआ पास से गुजरने का,
कुछ खोया हुआ एहसास था चारो तरफ,
देखा कुछ चंद सवालों से लिपटा तेरा चेहरा,
शिकन बन तेरे चेहरे पर बन आई ख़ामोशी।।

यूँ तो रिश्ते नाते बहुत हैं ज़िन्दगी में,
सजदे सा हँस देता हूँ,
ऐसी है कुछ साथ तेरी!!!!

ये दोस्ती तुम्हारी एक एहसास है,
बिन पन्नों के किताब है ये,
ज़िन्दगी में रंग भर देती ये दोस्ती,
हम इंसान तो इंसान भगवान् भी इससे अछूते नहीं!!!!
सजदे सा हँस देता हूँ,
ऐसी है कुछ साथ तेरी!!!!

Tuesday, June 4, 2013


ख़ामोशी का पहरा .......!!

सहसा ख़ामोशी में घिरा हुआ पाया खुद का चेहरा,
मैंने डरते हुए  देखा था ख़ुशी पर ख़ामोशी का पहरा!!

सहसा बात बदल कर,मन शांत करके,
फिर कुछ छेरा बातें पुरानी।

मंडिया कई थी,ठेले अनेक थे,
पर कहीं कोने में मचल रहा था रंगीन गुब्बारे तुम्हारे,
ठिठक गया था मैं वहीँ,भा गए थे वे गुब्बारे!!

सोचके मैं करता क्या????
भा गए थे वे गुब्बारे!!!

बिखर गए शाम हमारे,
रात का इंतज़ार करते।।

नींद बिखरे हैं,ख्वाब देखते तुम्हारे,
 
बाहर के आंधी से था,मन का तूफ़ान था कहीं बढ़कर ,
बहार के आघातों से,मन का अवसान था कहीं बढ़कर,
फिर भी मेरे मन ने तुमको उरने की गति चाहि।।
 

Sunday, April 21, 2013

बहुत दर्द देकर,शायद  .....!!

माँ बहुत दर्द सहा मैंने,बहुत दर्द दिया तुम्हें,
एक तू ही तो थी मेरी दर्दों का हमसफ़र,

तुझसे आज में बिदा हो रही हूँ,बहुत दर्द सहकर
 आज जब हमारी बिदाई की खबर सुर्ख़ियों में आयेगी,
सफ़ेद ज़ोरों में देखकर मेरे साथ सिसक-सिसक कर मरने का ढोंग करेंगे,
बहन-बेटी होने पर अफ़सोस जताया करेंगे,
माँ उनसे बस उतना कहना दरिन्दों की दुनिया में संभल के रहना।
माँ जब भी राखी आयेगी,भईया की कलाई सुनी रह जाएगी,
याद मुझे कर उनकी आँखें सूझ जाया करेंगी,
पर माँ तू उन्हें रोने मत देना,
तिलक लगाने को मेरा मन भी मचला करेगा,
पर माँ तू उन्हें रोने न देना।
पा भी छुप-छुप कर आंसू बहाया करेंगे,
सारा इलजाम अपने पर लेंगे,
माँ पर तू यह होने ना देना,
बोलना वो तो अभिमान थे मेरे,
तू बस इतना ही कह देना उनसे।
माँ तुम्हारे लिए अब मैं क्या कहूँ??
दर्द को भी तुमसे शर्म आने लगेगी शायद,
माँ तुझे लोग बहुत बोलेंगे,
मेरा ठीक से खयाल ना रखने का इलज़ाम लगायंगे,
माँ सब सह लेना,उनलोगों को जमकर जवाब देना,
और कहना अगले जनम मोहे बिटिया ही देना भगवन।
माँ पर उन नेताओं को जरुर कहना,
मुबारक हो आपको,
अपना शक्ल दिखाने का दोबारा मौका मिल गया तुम्हें,
फिर भी ना माने तो बोलना,
हजारो सवालों से अच्छी है ख़ामोशी आपकी!!

Thursday, March 21, 2013

महाराष्ट्र में सुखा और अकाल परा है,और एक ओर नेता और संत अपने में मद-मस्त हैं। इन सब को ध्यान रखते हुए एक गरीब का हाल बयाँ कर रहा हूँ।

एक रोटी

गाँव में अकाल परा था,
 नेता जी मद-मस्त परे थे,
एक-एक रोटी की  कमी थी,
किसान मरे फिर रहे थे,
फिर भी नेता जी मद-मस्त परे थे।

एक गाँव के बृद्ध ने अपने एक हमउम्र से पूछा,
तब बुढऊ कितना रोटी खायेगा,
बरा ही मासूमियत से उसने जवाब दिया ५।
पहला बुढऊ ने पूछा,
इस उम्र में ५!!
दुसरे ने जवाब दिया "हाँ"....!!

 पहले बुढऊ  ने पूछा,
एक खाने के बाद जगह बचेगी,
पेट है ही कितना बरा तुम्हारा??
दुसरे बुढऊ ने बरे ही भोलेपन से जवाब दिया,
यही तो मलाल है,
एक रोटी ही कहाँ नसीब हो रही??
 
 सोचियेगा जरुर....!!

Wednesday, March 13, 2013

आतंकवाद और राजनीति

सूरज को किसने रोते हुए देखा होगा??
मैंने देखा है सूरज को नम आँखों में,
लोगों ने पूछा कहाँ??

मैंने कहा ताज को तो देखा ही होगा,
जहाँ हमारी संस्कृति बस्ती है,
इंसानियत पे जब हमला हुआ था,
तब तो इसे हिन्दू और मुस्लमान न पता थे,
और न कभी होगा।
फिर ये हमला क्यूँ??
तब सूरज ने बादल के सहारे आंसू बहाया होगा।

  जहाँ-जहाँ हम लोगों की ख़ुशी खिला करती थी,
जहाँ मासूम बच्चे दाने खिलाया करते हैं पंक्षी को,
जहाँ मासूम अपनी दिन बिताया करते हैं,
जहाँ-जहाँ लोग खुशियाँ मनाया करते है,
जहाँ के आवाम गीता और कुरान दोनों पढ़ते होंगे,
क्यूँ वहां बारंबार लोग अपने कुकृत्य से,
इंसानियत को शरमशार करते हैं??

क्यूँ जब देश के बेटे अपने प्राण आहुति मैं दे देते,
अपनी माँ के लिए,
तो कुछ लोग उन्हें नमन तक नहीं करते??
उल्टा उन काफिरों का समर्थन करते,
जो इंसानियत के दुश्मन बने हुए हैं??
घृणा होती है मुझे उनलोगों पर,
जो शहीदों के शव पर भी,
गन्दी राजनीती से तौबा नहीं करते।

फारुख साहब जरा अपने बेटे उमर को तो सरहद पर भेज के देखें,
की कैसा लगता है उस बाप को 
जिसको अपने बेटे की लाश को कान्धा देना परता होगा??
अब ये सब देखकर हमारे सूरज देवता कैसे न रोए?
छुप-छुप कर ही सही,
मैंने देखा है उन्हें बीच समुद्र में आंसू बहाते हुए।।

Saturday, March 2, 2013

.......बहुत याद आती हो आप

 जब भी मैं बाहर निकलता,
एक माँ को देखता हूँ अपने बच्चे लिए,
बहुत लार-प्यार से सींचती है अपने जिगर के टुकड़े को,
खुद तो खाती नहीं पर बच्चा भूखा न रहता कभी,
जिगर से चिपका रखती,
कहीं इस जालिम दुनिया में कहीं गुम न जाए।

रात भर खुद तो जगती है,
और बच्चे को रात भर थपथपाया करती है,
मौत का आगोश में जब तक समां नहीं जाती आप,
तब तक सो नहीं पाती आप,
रिश्तों का भी अजीब सा चक्र है,
चोट मुझे लगती,और बेचैन आप रहतीं,
ज़िन्दगी भर भगवान से कुछ न मांगती,
सिवाए हमारे खुशीओं की कभी न फूटते गुब्बारे।

जब भी कभी रोया करता था मैं,
सारा चूल्हा-चौकी फ़ेंक,
भाग कर आती थी हमारे पास,
कहीं मेरा लाल रोते-रोते बेहाल न हो जाए।

जब भी कभी परीक्षा की घरी आती,
तो मानो ऐसा लगता जैसे परीक्षा मेरी नहीं खुद उनकी हो,
मैं सो जाऊं तब भी  रात-रात भर दूध के गिलास लिए हाज़िर रहती वो,
और सुबह-सुबह दही-चीनी लिए हाज़िर रहती है वो,
की कहीं मेरा लाडला कहीं गलती न कर जाए।

जब भी परीक्षा मैं कम अंक आते,
हमारी तरफदारी करना न भूलती वो,
पापा के डांट से हमेशा बचा लेती वो,
पर आंख के किन्हीं कोने में आंसू जरुर रहता।
नहीं पता किस पवित्र चीज़ से बनी हुई है वो,
हरेक जिद को हंस कर पूरा कर देती वो।

कलेजे पर पत्थर रख,और आँखों में आंसू भर,
बहार पढने भेज देती वो,
इस आस में की हम पढ़-लिख लेंगे,
और ज़िन्दगी में बरा नाम कमायंगे हम।
जब कभी बीमार होती,
पापा से कहती खबर न करना मेरे लाल को,
ख़ामोखां परेशां हो जायेगा वो।

यह जिंदगी भी कितनी जालिम है,
चाह कर भी पास न जा पाता मैं, 
हर पल माँ तुम्हारी याद आती है!!
हर पल यही कहती जहाँ भी रहो खुश रहो,
और मेरी परवाह न करो।
यह सुन आँखे नम हो जाती,
बहुत याद आती हो आप माँ।।