Sunday, February 3, 2013

पढ़े-लिखे अनपढ़।

किसी अनजानी गली से पार हो रहा था,
तभी कानों में किसी पंडित के मधुर स्वर सुनाई परा!!
मुख वो अच्छा, जो कृष्णा जी का चिंतन किया करे,
नेत्र वो सुन्दर, जो कान्हा जी की छवि निहारा करे!!

आस-पास नज़र दौराई,
चारों तरफ इमारतें ऊँची भरी परी थी,
फिर ख्याल आया इसका क्या फ़ायदा??
लोगों ने दिल तो छोटी कर ली थी,
रास्ते तो चौरे मिलते,
पर नज़रिया तंग कर लिए थे,
हवाई जहाज में यात्रा कर दूरियाँ घटा लेते थे,
पर दिलों के फासले बढ़ गए थे।

कौन दुश्मन,और कौन अपने सब कुछ धुंध सा है,
पढ़े-लिखे सभ्य तो हैं,
पर बेटी जन्मे तो कहते,वंश कैसे बढ़ेगा??
एक फल के चाहत मैं बाग़ ही उजार देते ,
उनको ये शायद यह पता नहीं कि,
की फूल रहे ना धरती पर तो
फल कैसे प्राप्त करेंगे??
 
चलते तो हैं अपने a/c कार में,
पर फेंकते है कूड़ा करकट सड़कों पर
मानो फ़ेंक रहे हैं 
अपनी नकली सभ्यता का 
मुखोटा उतार कर,
'यहाँ थूकना मना है' पढ़कर भी
सालों से वहीँ थूकते आ रहे हैं
मानो थूक रहें हैं
 अपने साक्षर होने के प्रमाण पत्र पर. 
 
ग़रीबों का सपना-सपना ही कहाँ होता??
अनिश्चितता के मकड़जाल में बुनता रहता है अपना सपना,
नेता के भाषण, वादों, जीत और कुछ भी न बदलने के चक्र में
दम तोड़ती नज़र आती है
पदलोलुपता, महत्वाकांक्षा और भ्रष्टाचार के शासन तले
लात हर बार उसके पेट पर ही मारी जाती है.
नहीं समझ पाता वो
बढती महंगाई में भी, शेयरों के भाव क्यों गिरते हैं?
पर हम पढ़े-लिखे लोगों को इससे क्या मतलब??
उनका पहिया तो हमेशा चलता रहता,
वोट उसे ही देते जो विकलांगो के पैसो को भी नहीं बक्श्ते,
खुर्शीद साहब सोचते होंगे गरीबों का क्या अर्थ,उन्हें तो चंद पैसे देकर साथ ले लेंगे ??
क्यूंकि ये पढ़े-लिखे लोगों को क्या मतलब??
उन्हें तो अपने से मतलब है,
क्यूंकि वो तो वोट देने ही नहीं जाते।। 
 
क्या सच में हैं हम शिक्षित ??
क्या सच में हैं हम साक्षर ?
 आस्चर्य होता किसी के मुख से यह सुनकर की,
मुख वो अच्छा, जो कृष्णा जी का चिंतन किया करे,
नेत्र वो सुन्दर, जो कान्हा जी की छवि निहारा करे!!
क्यूंकि मुख पे तो कृष्ण और अल्लाह रहते
पर दिल मैं हमेशा बैर ही रहता।। 

Thursday, January 31, 2013

 तन्हाइयों मैं गुजरा करती है रात

आजकल अक्सर तन्हाइयों मैं गुजरा करती है रात 
पता नहीं क्या खास दिया था खुदा ने तुझमे,
सवाल किया करता हूँ अपने-आप से रात भर,
एक बार नहीं सौ-सौ बार,
पर जवाब कभी न आता है जुदा सा,
हर पल दिल कहता है देर है अंधेर नहीं।

ख़ामोशी से रहने का आदत नहीं है ,
 पर जब भी मैं निकलता था सर-ए-बाज़ार में,
तो लगता था मुझपे आवारगी का इलज़ाम,
और जब तन्हा रहा करता था,
तो लगता था इलज़ाम-ए-मोहब्बत का, 
यही सब बातों ने हमें लिखने पर मजबूर कर दिया,
शीशा हूँ, टूटूंगा तो बिखरूंगा ही,
पर एक खनक के साथ,
खनक के साथ एक खामियाजा भी छोर जाऊंगा।

कभी अपने इस  नादानी पर गुस्सा आता है,
तो कभी पूरी दुनिया को हँसाने को जी चाहता है।
कभी छुपा लेता हूँ दर्द को दिल के किसी कोने में,
तो कभी किसी को सब कुछ चिल्ला-चिल्ला कर सुनाने को जी चाहता है।
कभी रोया न करता था दिल के मामले में,
पर कभी यूँ ही आंसू बहाने का जी चाहता है।
कभी हंसी आ जाती है बीती बातों को याद करके,
तो कभी उसे तुरंत भुलाने को जी चाहता है।
कभी-कभी खुले आसमान को निहारने को जी चाहता है,
तो कभी बंद कमरे मैं तकिया से भी जी उचटता है।
कभी सोचता हूँ कोई नयी मिल जाए इस जालिम सफ़र में,
तो कभी हर पल तुम्हारे लिए जिए जाने को जी चाहता है।।

Monday, January 28, 2013

ब्लॉग का शौख!!  

आजकल एक नया शौक चढ़ा था,
कविता लिखने का,
इसी चक्कर कमबख्त मैंने अपना ब्लॉग शुरू किया,
सोचा था अब इस ब्लॉग के महफ़िल में आने से 
जरा मशहूर भी हो जाऊंगा।
 
बहुत मेहनत से सींच रहा हूँ हरेक पोस्ट को इस ब्लॉग का,
पर कमेन्ट तो दूर की बात 
हाजरी भी बहुत मुश्किल से कोई लगाता।
बहुत मेहनत से उग़ा रहा था इस ब्लॉग के हर फूल को,
सोचा था महक उठेगा ये कमेंट की खुशबू से!!
क्यूंकि टिप्पणियाँ ही करती है इसे अमर,
किसी तुकबंदी से काम चला लेता मैं,
फर्क न परता मुझे 
यदि वो  "SUMAN " का सिर्फ LIKE ही क्यूँ ना होता।।

कुछ न सूझ रहा हो तो कम से कम यूँ (;) मुस्कुरा ही देने का है,
हौसला अफजाई ही करते,
कम से कम देखने वालों का तादाद ही बढ़ा देते।
माना की मेरे ज़श्न मैं तुम्हे शरीक होने का मन नहीं,
कम से कम ताली तो बजा देते।।
 
पसंद तुम्हे आये चाहे ना आये,
पर कमबख्तों टिकट तो हमने INTERNET का कटवा ही लिया है,
पैसा तो मैं गवां चुका,
अब पसंद आये चाहे न फिल्म तो देखनी ही परेगी तुझे।
 मातम मनाने से तो अच्छा है,
फीकी मुस्कान तुम्हारी।।
फीकी हँसी भी असर करेगी कमबखत!!
 
अब जब आ ही गया हूँ ब्लॉग के इस महफ़िल में,
तो कोई तो निशानी छोर जा रे,
कमबख्तों कमेंट न सही,
कम से कम,
हाजरी के लायक तो हूँ ही।।

Friday, January 25, 2013

माँ  


बहुत दुःख दिया था मैंने उसे,
खुदा ने माँ को शायद इस खातिर बनाया था 
ताकि इस धरती पर भगवान के साक्षात् मूरत रह सके।।

भूल गया था मैं की ये वही माँ है,
जब भी आँसू आते थे हमारी आँखों मैं,
सबसे पहले वो ही आती थी इस कम्बख्त के आंसू पोछने को,
आज भी रोती है वो हमारे चले आने के गम में,
शायद मैं यह भूल गया था की 
"माँ तो माँ ही होती है आंखिर"।।

जब भी मैं निकला करता था धुप मैं,
अपने आँचल से छाँव दिया करती थी वो,
और खुद चिलचिलाती धुप मैं जला करती थी वो,
कितनी भोली होती है उसकी सूरत??
खुद के ऊपर धुप और मेरे ऊपर प्यार का छाँव,
आज भी रोती है वो हमारे चले आने के गम में,
शायद मैं यह भूल गया था की 
"माँ तो माँ ही होती है आंखिर"।।

हर पल उसने ख़ुशी और प्यार दिया,
बदले मैं मैंने सिर्फ और सिर्फ गम और आंसू दिया।
अनगिनत दुःख दिया था मैंने उसे 
पर फिर भी हँसते-हँसते सह जाती थी वो,
आज भी रोती है वो हमारे चले आने के गम में,
शायद मैं यह भूल गया था की 
"माँ तो माँ ही होती है आंखिर"।।

आज मुझे एहसास हुआ है खुदा,
क्यूँ देता है उसे तू एक जुकाम भी??
वो तो कभी भी इस दुःख का हकदार न थी??
क्यूँ देता है तू दुःख उस??
मेरी दी हुई दर्द क्या कम कष्टदायक थी??
माँ का क़र्ज़ तो संतान ही अदा करता है ना?
आज भी रोती है वो हमारे चले आने के गम में,
शायद मैं यह भूल गया था की 
"माँ तो माँ ही होती है आंखिर"।।

हर रोज़ तुम्हारे दर पर दीये जलाया करूँगा,
फिर कभी न उसे रुलाऊंगा,
कभी मन न भरेगा हमारा प्यार से उसका,
माँ की जरुरत भला किसे न होगी??
आज भी रोती है वो हमारे चले आने के गम में,
शायद मैं यह भूल गया था की 
"माँ तो माँ ही होती है आंखिर"।।

उसके हर मुश्किलों को हमारे पास भेज दिया कर,
आंखिर माँ की जरुरत कब और किसे कहाँ-कब न होती??
 आज भी रोती है वो हमारे चले आने के गम में,
शायद मैं यह भूल गया था की 
"माँ तो माँ ही होती है आंखिर"।।

मेरी हर ख़ुशी मुझसे ले ले तू ,
पर बदले मैं मेरी माँ को हमेशा खुश रख तू।
मेरी तन्हाईयों का और कोई साथी न हो सकता,
आंखिर माँ किसी को भला थोरे ही बार बार मिलती??
आज भी रोती है वो हमारे चले आने के गम में,
शायद मैं यह भूल गया था की 
"माँ तो माँ ही होती है आंखिर"।।

Thursday, January 17, 2013

बचपन 


बहुत याद आतें है वो दिन,
वो बचपन के दिन 
जब माँ के हाथ झुला बना करते थे 
और मैं उन हाथों का झुला ,
खुद के  बाहों मैं वो झुलाती थी
केवल मेरे लिए ही लगता था वो।

बहुत याद आती है वो ममता 
जब कभी भी चोटें आया करती थी,
सारी दुनिया को वो छोर 
सिर्फ मुझपर ही ध्यान दिया करती थी वो।

बहुत याद आतें है वो दिन
जब कभी भी रोया करता था मैं 
पूरा-पूरा रात गुज़ार देतीं थी मेरे क़दमों पे।

मुझको वो ममता याद आती है,
रोज़ यादें उनकी सताती है,
आँखों से अश्रु चाह कर भी रूकती नहीं।
मैं और मेरी बहन 
गहने थे उनके जिंदगी के,
कितना प्यारा था वो जमाना।

पर कैसा है ये जमाना??
अपनो को ही भूल-बैठे हैं हम।
कितना प्यार करती है वो बहिन 
जिसको रक्षा करने का वचन तो दे देते 
पर इस पास्चात्य संस्कृति में बोल कहाँ मायने रखते अब??
पर आज भी वो उतना ही प्यार करती जितना कल।

भूल गए हैं हम ममत्व के बाबुल को
करती वो प्यार आज भी कितना 
आंखिर माँ तो माँ ही होती है।
हमको भी याद आयेगा उनका साया,
जब आयेगा हमें भी बुढ़ापा,
है वक़्त अभी भी सँभालने का,
सही वक़्त है उन्हें असली हक देने का,
प्यार करो अपने माँ-बाप से 
भूल कर ये सारा संसार।

माफ़ी माँग उस मौला से 
क्यूंकि वे ही भगवन के असली रूप हैं 
ये बचपन की याद मुझे बहुत सताती हैं 
सताती हैं ये बचपन के याद बहुत ही।। 

Monday, January 14, 2013

हम 


नींद न आ रही थी कई रातों से,
न ही आसमान मैं तारे गिने जा रहे थे,
ऐसा लग रहा था मानो देश में  अकाल परा  हो
शायद ये पहली बार था की ये अकाल अनाज के लिए नहीं था 
अकाल परी थी राजनीति का,
अकाल परी थी सोच का,
अकाल परी थी इंसानियत का,
एक जगह लोग प्राण गवां रहे थे दूसरों के  भविष्य के लिए 
और एक तरफ लोग अपने स्वार्थ मैं मदहोश हो रहे थे ।

आज के लोग प्यार में जहर के प्याले पीने को तैयार होते हैं ,
पर उन रूहों का कुछ नहीं जिन्हें पानी भी नसीब नहीं ,
लोग होटलों में हजारों का खाना छोर देते ,
उन रूहों का क्या जो अनगिनत रातें भूखे पेट बिताते??
आज सिर्फ हमारे ही अरमानों का मोल है,
पर उन अरमानों का क्या जिन्हें किताबें भी नसीब नहीं?

 उन्हें तो ये भी भी सोचने का हक नहीं की 
ये काली दुःख के बादल पिघलेंगे  और सुख का सागर आयेगा।
आज मिट्टी की भी कीमत मिलती है,पर इंसानों का कुछ मोल नहीं 
हर बात को पैसों में  आकने लगे हैं हमारे राजनेता।
कितने अदभुत हैं हम लोग,कितने महान हैं हम।
कितनी निष्ठा और धीरज है इन मानवता के राजनेताओं में,
इनको शत शत नमन हमारी!!

हमारी शान झूठे और नकली सिक्कों से तोली जाने लगी है,
 हरेक रात के बाद उजाला आती है,
 उम्मीद है वो सुबह जल्दी आये ,
ख़ुशी होगी यदि ये हमारे जीवनकाल में ही आए।।

Sunday, January 13, 2013

राजनीति और सियासत 

राजनीति और सियासत सुनते ही मन मैं एक भूचाल सा होता है,
 किन्ही  महापुरोसों का आभास होता है,
किन्ही स्त्रियों का अंश याद आता है,
उस माँ के ममत्व का याद आता है,
उस प्यार का याद आता है जिसमे मर मिटने की कसमें खाई जाती है 
उस प्यार का याद आता है जो दूर रहते हुए भी एक बने रहते हैं 
उस प्यार का याद आता है जिसमें मरने पर भी गर्व होता है।

शेरों की लाश आती है  बिना सर के,
सीमा पर जवान खाना त्याग दते हैं,
पर प्यार की कीमत लगाने मैं चुक नहीं करते।
 ममत्व अब मायने नहीं रखते। 
ये ठंडी शीतलहर ने शायद इस प्यार को जमा कर रखने की हिमाकत की है। 

ऐ शीतलहर तू जानती नहीं इस प्यार और  ममत्व की शक्ति 
ये ममत्व ये प्रेम जरुर उठेगा,
ये प्रेम जरुर उठेगा उन शेरों का बदला लेने लिए 
अपने भूल के लिए,अपने उन कपूतों की गलती के लिए 
मातृभूमि की इन सपूतों का रक्त जाया न होने देंगे, 
जरुर दहारेंगे हम और ऐसा की पुरी दुनिया  ये दहार देखेगी।।